ललिता माता कौन है, इनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

ब्रह्मांड पुराण में बताया गया है कि भगवान शिव का एक बार नाम लेने से महा विष्णु का एक हजार बार नाम लेने का फल मिलता है। इसी प्रकार मां ललिता की एक बार नाम लेने से भगवान शिव के 1000 नाम लेने के बराबर फल मिलता है। आइए जानते हैं आज के लेख में क्या क्या जानेंगे :-

1. ललिता माता कौन है?

2. ललिता माता की उत्पत्ति कैसे हुई ?

3. ललिता माता का मंत्र व 10 महाविद्याएं

4. ललिता चालीसा पाठ के फायदे व लाभ

1. ललिता माता कौन है?

ललिता माता देवी सती – पार्वती का ही रूप है। ललिता माता को त्रिपुर सुंदरी, षोडशी तथा ललिता त्रिपुरसुंदरी के नाम से भी जाना जाता है। माता त्रिपुर सुंदरी 10 महाविद्याओं में से एक हैं।

ललिता मां के तीन स्वरूप हैं। 8 वर्ष की बालिका के रूप में त्रिपुर सुंदरी, 16 वर्ष की अवस्था में षोडशी तथा मां का युवा स्वरूप ललिता त्रिपुर सुंदरी के नाम से जाना जाता है। मां ललिता त्रिपुर सुंदरी 16 कलाओं में निपुण है इसलिए भी इन्हीं षोडशी कहा जाता है।
प्रतिवर्ष माघ मास की पूर्णिमा तिथि को ललिता माता की जयंती मनाया जाता है। नवरात्रि में नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता के साथ ललिता पंचमी का व्रत किया जाता है। इसे उपांग ललिता व्रत भी कहा जाता है।
पुराणों के अनुसार ललिता माता की दो भुजाएं हैं। यह माता गौर वर्ण होकर रक्तिम कमल पर विराजित हैं। दक्षिणमार्गी शास्त्रों के मतानुसार देवी ललिता को ‘चण्डी’ का स्थान प्राप्त है। इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है। देवी ललिता का ध्यान रूप बहुत ही उज्ज्वल व प्रकाशवान है।
ललिता माता की पूजा आराधना कभी भी कर सकते हैं परंतु ललिता जयंती या ललिता पंचमी को इनकी पूजन आराधना का विशेष महत्व है। ललिता जयंती के दिन मंदिरों में मां के भक्तों का भीड़ उमड़ा रहता है। इस दिन स्कंदमाता व भगवान शिव की भी पूजा की जाती है।

मां ललिता की पूजा आराधना करने से भक्तों को सुख समृद्धि व मोक्ष की प्राप्ति होती है। व्यक्ति जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

ललिता माता का नाम 10 महाविद्याओं में तीसरे नंबर पर आती है। ललिता पंचमी का व्रत बहुत ही मंगलकारी व शुभफलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ललिता देवी की पूजा जो व्यक्ति सच्चे मन व पूर्ण श्रद्धा भक्ति से करता है, उसे ललिता माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि यह व्रत सुख, संपत्ति देने वाला है। जो नि: संतान हो, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। संतान के सुख एवं उसकी लंबी आयु की कामना के लिए इस व्रत को किया जाता है।
आगे हम ललिता माता का मंत्र व 10 महाविद्याएं कौन सी है, यह जानेंगे। पर उसके पहले आइए जानते हैं ललिता माता की उत्पत्ति की कहानी।

2. ललिता माता की उत्पत्ति कैसे हुई?

पुराणों में हमें ललिता माता की उत्पत्ति के बारे में दो कथाएं मिलती है। देवी पुराण के कथा अनुसार ललिता माता की उत्पत्ति की कथा मां सती के देहत्याग (मौत) से जुड़ी है। देवी सती कौन है? उनके देहत्याग से मां ललिता की उत्पत्ति की कथा कैसे जुड़ी है, आइए जानते हैं

मां आदिशक्ति का अवतार सती जी महाराज दक्ष की पुत्री है। सती ने जब शिव जी को देखें तो उन पर मोहित हो गए और उनसे शादी का निश्चय कर लिया। महाराज दक्ष ना चाहते हुए भी सती का विवाह शिव जी के साथ कर दिया।

महाराज दक्ष सती का विवाह हालांकि शिव जी से कर दिए लेकिन वह उस शादी से संतुष्ट नहीं थे। माता सती अपनी मर्जी से शादी किए थे। दक्ष को शिव जी का हाव भाव वेशभूषा कुछ भी पसंद नहीं था।

ब्रह्मा जी महाराज दक्ष को प्रजा का पालक अर्थात प्रजापति का पद दे दिया। प्रजापति का पद पाकर महाराज दक्ष में और ज्यादा अहंकार आ गया। प्रायः महान अधिकार की प्राप्ति से मन में अहंकार आ ही जाता हैं। संसार में ऐसा कौन हैं। जिसे प्रभुता पा कर मद न हो।
एक बार ब्रह्मा जी ने धर्म की निरुपण के लिए धर्म सभा का आयोजन किया। इस धर्म सभा में बड़े-बड़े ऋषि मुनि व देवता उपस्थित थे। उस सभा में भगवान शिव जी भी उपस्थित थे।

जब दक्ष प्रजापति वहां पधारे तो उनकी स्वागत में सभी ऋषि मुनि वह देवता गण खड़े हो गए। केवल ब्रह्मा जी और भगवान शंकर अपनी जगह पर बैठे रहे। ब्रह्मा जी दक्ष प्रजापति की मानस पिता हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी को प्रणाम किया।
शंकर जी का बैठे रहना दक्ष प्रजापति को पसंद नहीं आया क्योंकि ब्रह्मा जी उनके पिता थे इसलिए उनका खड़ा ना होना उनको सही लगा परंतु शिवजी उनके दामाद थे इसलिए उनका खड़ा ना होना उनको अभिवादन ना करना दक्ष को अपना अपमान करना लगा। प्रजापति दक्ष को इस बात से विशेष कष्ट हुआ कि उनके दामाद शंकर जी उन्हें प्रणाम नहीं किए। इस बात से व्यथित महाराजा दक्ष ने शंकर जी की बड़ी ही निंदा की । शंकर जी को असभ्य भ्रष्ट कहा। उन्हें श्राप तक दे डाला कि किसी भी यज्ञ में उन्हें कोई भाग नहीं मिलेगा। इतने में भी महाराज दक्ष का क्रोध शांत नहीं हुआ।

प्रजापति दक्ष भगवान शंकर को अपमानित करने के उद्देश्य से बहुत बड़ा विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में सभी ऋषि मुनि देवी देवताओं को आमंत्रित किया किन्तु शंकर जी और माता सती को यज्ञ के लिए आमंत्रित नहीं किया।
सभी ऋषि मुनि व देवताओं को अपने अपने विमान से जाते देखकर देवी सती शंकर जी को पुछते हैं कि ये सभी लोग कहां जा रहे हैं। तब भगवान भोलेनाथ शंकर जी देवी सती को बताते हैं कि आपके पिता महाराज दक्ष बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया है। ये सभी लोग उस यज्ञ में सम्मिलित होने जा रहे हैं।
देवी सती बोले – प्रभु बहुत दिनों से मायके गई नहीं हूं, वहां यज्ञ हो रहा है तो मेरी बहने भी अवश्य आएंगे। यदि आपकी आज्ञा हो तो हम दोनों को भी वहां चलनी चाहिए, भले ही उन लोगों ने हमें निमंत्रण नहीं दिए हैं लेकिन कहा गया है कि माता पिता और गुरुजनों के पास जाने के लिए आज्ञा की जरूरत नहीं होती ।
भगवान शंकर जी बोले कि आपने बिल्कुल सही कहीं हैं माता पिता और गुरुजनों के पास जाने के लिए उनके आज्ञा की जरूरत नहीं होती। माता पिता और गुरुजनों के यहां बिना बुलाए भी जाया जा सकता है। लेकिन यहां पर बात कुछ अलग है। अगर कोई विरोध मानता हो तो वहां जाने में कल्याण नहीं होता है। महाराज दक्ष कों हमारा वहां आना पसंद नहीं है, वह जानबूझकर हमें निमंत्रण नहीं दिया है इसलिए वहां जाना सर्वथा उचित नहीं होगा। इसलिए हे देवी वहां जाने का विचार त्याग दीजिए यही उचित होगा।

भगवान शिव के समझाने के बाद भी माता सती यज्ञ में जाने के लिए हठ करने लगी। जब माता सती नहीं माने तो भगवान शंकर जी ने उन्हें अपने गण वीरभद्र व नंदी के साथ भेज दिया। सती जब अपने पीहर पहुंची तो सभी उनसे उपेक्षा करने लगे। महाराजा दक्ष उनका कोई सत्कार नहीं किया। बहनों ने जब उन्हें देखें तो व्यंग पूर्वक मुस्कुराने लगी आपस में बोलने लगी की देखो सती बिना निमंत्रण के आ गए हैं। वहां केवल उनकी माता ही प्रेम से मिली। देवी सती जब यज्ञशाला मे आए तो देखा कि वहां सभी देवताओं के लिए भाग निकला था पर वहां शिवजी के लिए कोई भाग नहीं निकला था। सती अपने पिता महाराज दक्ष से पूछते हैं कि शिव जी का ऐसी अवमानना किसलिए? महाराज दक्ष शिव जी को बड़ा भला-बुरा कहते हैं, वे कहते हैं कि मैं तो शिव को देवता मानता ही नहीं। वह तो भूत प्रेत पिसाचों का स्वामी है। नग्न रहने वाला है। शरीर में शमशान का राख लगाने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा?
महाराज दक्ष की बातों को सुनकर सती की आंखे क्रोध में लाल हो गई और वो कहने लगी कि जिन भगवान शिव का नाम बातचीत के प्रसंग में अनायास ही आ जाने पर भी नाम लेने वाले के समस्त पापों का नाश हो जाता है। जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। आप ऐसे शिव से द्वेष रखते हैं। आप का अंत निकट है महाराज।

नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। आप शिव जी से द्वेष रखते हैं। अत: आपके संसर्ग से उत्पन अपने इस शरीर को मैं तत्काल त्याग दूँगी क्योकि यह शरीर मेरे लिए यह कंकाल समान हैं। ऐसा कहकर सती ने भगवान शिव का ध्यान करके यज्ञकुंड की अग्नि में अपने शरीर को भस्म कर दिया। माता सती का दिव्य पति प्रेम आज भी नारियों के लिए महान आदर्श हैं। पिता के द्वारा अपने पति के किए अपमान से नाराज सती यज्ञ कुंड में कूद गई और अपने प्राण त्याग दिए। बस यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है।
माता सती के यज्ञकुंड में आत्मदाह करने को देखकर वीरभद्र ने क्रोध में आकर दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। जब ये बात भगवान शिव को पता चली तो वह मां सती के प्रेम में व्याकुल हो गए और अपना सुध बुध खो बैठे। इसके बाद भगवान शिव ने दुखी होकर माता सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर तांडव नृत्य शुरु कर दिया। माता सती के शव को कंधे पर रखकर विश्व भर में घूमना शुरू कर दिया। भगवान शिव की इस स्थिति से संपूर्ण विश्व की व्यवस्था बिगड़ने लग गई।

ऐसी विकट परिस्थिति को देखकर विवश होकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इसके बाद माता सती के शव के अंग जहां-जहां गिरे वहां उन स्थानों पर उनके अंगों से शक्ति विभिन्न प्रकार की आकृतियों से उन स्थान पर विराजमान हुई और वहां शक्ति पीठ बनते चले गए। इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए।

देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। वहीं देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। बताया जाता है कि नैमिशराय में मां सती का हृदय गिरा था। देवी सती भगवान शंकर को अपने हृदय में धारण कर देहत्याग किये थे। शंकर जी को हृदय में धारण करने से उन्हें ललिता के नाम से पुकारा जाता है। इसलिए नैमिष एक लिंग धारिणी शक्ति-पीठ स्थल माना जाता है, यहां लिंग के स्वरूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है और यहां पर मां ललिता देवी का एक मंदिर है।

3. ललिता माता का मंत्र व 10 महाविद्याएं

दश महाविद्या – देवी शक्ति के 10 रूप

1. काली

2. तारा

3. षोडशी

4. भुवनेश्वरी

5. भैरवी

6. छिन्नमस्ता

7. धूमावती

8. बगलामुखी

9. मातङ्गी

10. कमला

ललिता माता का मंत्र :

‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः।’

4. ललिता चालीसा पाठ के फायदे व लाभ

किसी भी देवी देवता या भगवान की पूजा आराधना से मनोवांछित फल की प्राप्ति तभी होती है, जब सच्चे मन से किया जाता है। पूर्ण श्रद्धा वह सच्चे मन से श्री ललिता चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होता है, इस पर हमने अलग से एक विस्तृत आर्टिकल लिखा है। वह आर्टिकल आप नीचे क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

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